गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘सह-सा’

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हिन्दी की महत्वपूर्ण लेखिका गीतांजलि श्री का नया उपन्यास आया है ‘सह-सा’। ध्यान रहे कि 2022 में इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ के बाद यह उनका पहला उपन्यास है।

सबसे पहले, इस उपन्यास में इनर एक्सपीरियंसेज़ का प्रस्तुतीकरण लीनियर या सीधा नहीं है। व्यक्ति के मन की स्थिति—उसकी स्मृतियां, भय, असमंजस और अवचेतन—एक फ्लो की तरह आते हैं। यह एक्सपीरियंसेज़ किसी एक स्टेबल आइडेंटिटी को डिफाइन नहीं करते, बल्कि दिखाते हैं कि “सेल्फ” एक फिक्स्ड चीज़ नहीं, बल्कि लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है। इस तरह उपन्यास यह सवाल उठाता है कि क्या हम अपनी पहचान को कभी पूरी तरह समझ पाते हैं या नहीं।

उपन्यास चार अध्याय में है:- होना, न होना, अनागत और प्रारब्ध।

पुस्तक अंश | सह-सा | Samvad Booksसंवाद

“सह-सा” एक ऐसा उपन्यास है जो व्यक्ति को एक स्टेबल, फिक्स्ड आइडेंटिटी के रूप में नहीं देखता। बल्कि यह दिखाता है कि इंसान का अस्तित्व अनिश्चित, फ्रैगमेंटेड और लगातार बदलता हुआ है। एक्सपेरिमेंटल भाषा और नैरेटिव स्ट्रक्चर के थ्रू गीतांजलि श्री ने आइडेंटिटी और एग्ज़िस्टेंस के प्रश्नों को गहरा और नए अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।

‘होना’ का संदर्भ सामने से दृश्यमान घटनाओं और पात्रों से है। भूले जी और उनकी गृहस्थी यहाँ सजीव हैं। जीवंतता है। गृहस्थी का पूरा वैभव है। भूलेराम गृहस्थी संभाले हुए हैं। उनके भीतर एक ग्रामीण व्यक्ति का संस्कार है। यही कारण है कि वो तरह-तरह के साग और सब्जी लाने दूर तक चले जाते हैं। सबका बराबर ख्याल रखते हैं। अपने घर के नौकरों के साथ बराबरी का व्यवहार रखते हैं। घरेलू व्यवस्था में एक लोकतांत्रिकता है जहाँ सबके लिए उसके हिसाब से कुछ न कुछ है। एक संतुलन। यह संतुलन इतना सहज है कि बाकियों की नजर में वो ‘खलीहर’ या ‘अदृश्य’ होने लगते हैं। इसका एहसास उनको तब होता है जब एक गौरैया उनके बाँह पर बैठती है और उनकी तरफ देखती नहीं है। वहाँ से उनको अपने ‘न होने’ का एहसास होता है। ‘न होना’ जीवन को रसविहीन बनाता है। भूलेराम यहाँ ‘वापसी’ कहानी के ‘गजोधर बाबू’ जैसे दिखने लगते हैं। अंतर यह है कि गजोधर बाबू परिवार को खटकते हैं और भूलेराम को परिवार नजरअंदाज किए हुए है। गजोधर बाबू वापस काम पर चले जाते हैं और भूलेराम इस जीवन को ही छोड़कर चले जाते हैं।

अचानक होने वाली घटनाएं (सडन इवेंट्स)। उपन्यास में कई ऐसे पल आते हैं जो बिना किसी वार्निंग के घटित होते हैं। यह सडननेस एक एग्ज़िस्टेंशियल अनसर्टेनिटी को रिफ्लेक्ट करती है—ज़िंदगी प्रेडिक्टेबल नहीं है। व्यक्ति का कंट्रोल अपने जीवन पर सीमित है, और इसी अनप्रेडिक्टेबिलिटी के बीच उसकी आइडेंटिटी और एग्ज़िस्टेंस का निर्माण होता है। इससे एक तरह का एग्ज़िस्टेंशियल एंग्ज़ायटी भी उभरता है, जहां व्यक्ति अपने होने के अर्थ को खोजने की कोशिश करता है।

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एक्सपेरिमेंटल भाषा और शैली। “सह-सा” में भाषा पारंपरिक व्याकरण और स्ट्रक्चर को तोड़ती है—वाक्य अधूरे, टुकड़ों में या अलग फ्लो में आते हैं। यह एक्सपेरिमेंटेशन सिर्फ स्टाइलिस्टिक नहीं है, बल्कि अर्थ-निर्माण का हिस्सा है। जब भाषा टूटती है, तभी व्यक्ति के फ्रैगमेंटेड एक्सपीरियंसेज़ और आइडेंटिटी की कॉम्प्लेक्सिटीज़ सामने आती हैं। यानी भाषा यहां सिर्फ मीडियम नहीं, बल्कि मीनिंग का क्रिएशन टूल बन जाती है।

गीतांजलि श्री का वाक्य विन्यास हिंदी के प्रचलित वाक्य विन्यासों से अलग है। वाक्य विन्यासों के साथ प्रयोग की मदद से वह अपनी भाषा बनाती हैं। एक वाक्य है ‘थकान’। इस शब्द के बाद पूर्ण विराम है। आदमी थकता है तब रुकता है; सुस्ताता है फिर चलता है। उपन्यास में एक शब्द का यह वाक्य इसी थकान को महसूस करने और पाठक को घड़ी भर सुस्ताने के लिए प्रयोग में आया है। उनके यहाँ संज्ञा और सर्वनाम से ज्यादा क्रिया बोलता है। एक वाक्य है “चुप थी। चुप था। चुप थे। चुप हैं।” यहाँ लिंग से लिंग निरपेक्ष तक की क्रिया है। ऐसे वाक्य विन्यासों से जो रोचक और ‘गीतांजलि श्री नुमा हिंदी’ बनाती हैं उससे उनके उपन्यास की पठनीयता बढ़ती भी है और अटकाती भी है। यह उपन्यास रोचक वर्णन के कारण पठनीय बना है। यही पठनीयता इसके संप्रेषण को बाधित भी करती है। ऐसा लगता है कि लेखिका ‘कहने’ के अभाव में अपनी भाषा को ज्यादा ‘बोलने’ में खर्च करती जाती हैं।


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